18 जनवरी 2018

बिहार में जातीय उन्माद फैला कर मानव श्रृंखला असफल करने की हो रही साजिश..

बिहार में मानव श्रृंखला पे जातीय असर

बरबीघा में जातीय नफरत मत फैलाओ

शेखपुरा/बिहार

बिहार में दहेज प्रथा और बाल विवाह के विरोध में बनने वाले मानव श्रृंखला को असफल करने  के लिए जातीय नफरत फैलाने की गंभीर कोशिश की जा रही है। हद तो यह है कि यह कोशिश मुखिया पति जैसे सार्वजनिक जीवन में जुड़े रहने वाले जनप्रतिनिधियों के द्वारा किया जा रहा है। ऐसा ही एक मामला बरबीघा प्रखंड विकास पदाधिकारी के द्वारा बनाए गए WhatsApp ग्रुप में देखने को मिला। इस ग्रुप में मालदह पंचायत के मुखिया पति मधु कुमार ने मानव श्रृंखला में पिछड़े और दलित लोगों के शामिल होने पर एतराज जताते हुए लिखा कि पिछड़े और दलित जाति की बहू-बेटी ही मानव श्रृंखला में क्यों निकलती है?अगड़ी जाति की बहू-बेटी नहीं निकलती? मधु कुमार ने जातियों का नाम भी स्पष्ट रूप से लिखा।

यह बरबीघा की पवित्र धरती का अपमान है। पिछले साल बने मानव श्रृंखला में सभी जाति के लोगों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया और कहीं जातिवाद नहीं दिखा। इस साल भी सभी जाति के लोग इसमें शामिल होने के लिए उत्साहित हैं क्योंकि बाल विवाह और दहेज प्रथा का असर सभी जातियों पर व्यापक रूप से पर रहा है।

बरबीघा जन्म भूमि है बिहार केसरी डॉ श्रीकृष्ण सिंह की जिन्होंने देवघर मंदिर में पंडों का विरोध झेल दलितों का प्रवेश करा कर यह सिद्ध किया कि जातीय विद्वेष से समाज का सशक्तिकरण नहीं हो सकता।

और तो और स्वजातीय जमींदारों के विरुद्ध ही उन्होंने जमीनदारी प्रथा का सख्त कानून लाकर इसी सशक्तिकरण का प्रमाण भी दिया। कई मनीषी बरबीघा में जातीय विद्वेष को दूर करने का सतत प्रयास करते रहे जिसमें लाला बाबू, रामधारी सिंह दिनकर प्रमुख हैं। बावजूद इसके आज बरबीघा की धरती पर जातीय विष फैलाने का काम किया जा रहा है। यह घोर निंदनीय और समाज को तोड़ने वाला कदम है। समाज के बुद्धिजीवी, समाजसेवी और जागरुक लोगों को मुखर होकर इसका विरोध करना चाहिए। परंतु सरकारी लाभ उठाने वाले तो छोड़ दीजिए समाज के कथित प्रतिनिधि भी खामोश हैं जो बहुत ही चिंता का कारण है।

13 जनवरी 2018

देशद्रोही साबित करो गैंग माननीयों के पीछे

           चार माननीयों ने जब लोकतंत्र के लिए खतरे की बात कही तो स्वघोषित कट्टरपंथी और देशद्रोही साबित करो गैंग सक्रिय हो गई है। सोशल मीडिया पर तरह तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। वह भी तब जबकि सुब्रमण्यम स्वामी जैसे स्पष्टवादी व्यक्ति ने भी कह दिया है कि माननीय की ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता और उन्होंने विवश होकर ही चौथेखंभे की शरण ली होगी। ऐसी स्थिति में देशद्रोही साबित करो गैंग की सक्रियता वास्तव में खतरनाक संकेत है।

         सर्वोच्च संस्था के माननीय कि यह अभिव्यक्ति महज इस बात की घोषणा है कि लोकतंत्र में यदि किसी बात की सुनवाई नहीं होगी तो चौथेखंभे पर ही भरोसा किया जा सकता है। वैसे तो चौथे खंभे की विश्वसनीयता भी आज कटघरे में है। बावजूद इसके माननीयों ने चौथे खंभे पर ही भरोसा किया जो इस बात की भी घोषणा है कि पतन के बावजूद आज भी चौथाखंभा लोकतंत्र की इमारत का एक मजबूत आधार है।

     खैर, उधर देशद्रोही साबित करो गैंग माननीय के पार्टी विशेष, विचारधारा विशेष से जुड़े होने अथवा कई तरह के मामलों में धर्म विरुद्ध फैसले देने सहित कई तरह के प्रोपगंडा चला रहे हैं।

स्वघोषित कट्टरपंथी यह भी नहीं समझ पाते कि यह माननीय अपनी निष्ठा और ईमानदारी के दम पर भारत के लोकतंत्र को बचाने के लिए सतत प्रयासरत रहे हैं। यह विवाद सर्वोच्च संस्था के बीच का विवाद है और इस विवाद को गंभीरता पूर्वक कानूनविद ही समझ सकते हैं। इस मामले को लेकर सत्ताधारी पक्ष में भी राजनीति नहीं करने की बात कही है परंतु जो स्थिति सामने उभरकर आई है उससे यह स्पष्ट होता है कि स्थिति कहीं ना कहीं खतरनाक मोड़ की ओर अग्रसर है और इसे देश के सभी सर्वोच्च संस्थानों की सक्रियता से रोका जा सकता है।


उधर देशद्रोही साबित करो गैंग और कट्टरपंथी समाज की तरह बनने की घोषणा करने वाले गैंग की मानसिकता को भला कौन रोक सकता है। सभी लोग डुगडुगी बजा रहे हैं। सोशल मीडिया पर काफी शोर है। व्हाट्सएप के इनबॉक्स में काफी मैसेज आ रहे हैं! लगे रहिए, सर्वज्ञ आप ही हैं! व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान ही सर्वोपरि ज्ञान है! जय हिंद!जय भारत!

12 जनवरी 2018

विवेकानंद और वेश्या.. सोशल मीडिया के युग मे एक क्रांतिकारी विचार.. पढ़िए तो!

“विवेकानंद और वेश्‍या” – #ओशो

(सोशल मीडिया के उस युग के यह प्रसंग समसामयिक है।)


ऐसा हुआ कि विवेकानंद अमरीका जाने से पहले और संसार-प्रसिद्ध व्‍यक्‍ति बनने से पहले, जयपुर के महाराजा के महल में ठहरे थे। वह महाराज भक्‍त था, विवेकानंद और रामकृष्‍ण का। जैसे कि महाराज करते है, जब विवेकानंद उसके महल में ठहरने आये,उसने इसी बात पर बड़ा उत्‍सव आयोजित कर दिया। उसने स्‍वागत उत्‍सव पर नाचने ओर गाने के लिए वेश्‍याओं को भी बुला लिया। अब जैसा महा राजाओं का चलन होता है; उनके अपने ढंग के मन होते है। वह बिलकुल भूल ही गया कि नाचने-गाने वाली वेश्‍याओं को लेकर संन्‍यासी का स्‍वागत करना उपयुक्‍त नहीं है। पर कोई और ढंग वह जानता ही नहीं था। उसने हमेशा यही जाना था कि जब तुम्‍हें किसी का स्‍वागत करना हो तो, शराब, नाच, गाना, यही सब चलता था।
विवेकानंद अभी परिपक्‍व नहीं हुए थे। वे अब तक पूरे संन्‍यासी न हुए थे। यदि वे पूरे संन्‍यासी होते, यदि तटस्‍थता बनी रहती तो, फिर कोई समस्‍या ही न रहती। लेकिन वे अभी भी तटस्‍थ नहीं थे। वे अब तक उतने गहरे नहीं उतरे थे पतंजलि में। युवा थे। और बहुत दमनात्‍मक व्‍यक्‍ति थे। अपनी कामवासना और हर चीज दबा रहे थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो बस उन्‍होंने अपना कमरा बंद कर लिया। और बाहर आते ही न थे।


महाराजा आया और उसने क्षमा चाही उनसे। वे बोले, हम जानते ही न थे। इससे पहले हमने किसी संन्‍यासी के लिए उत्‍सव आयोजित नहीं किया था। हम हमेशा राजाओं का अतिथि-सत्‍कार करते है। इसलिए हमें राजाओं के ढंग ही मालूम है। हमें अफसोस है, पर अब तो यह बहुत अपमानजनक बात हो जायेगी। क्‍योंकि यह सबसे बड़ी वेश्‍या है इस देश की। और बहुत महंगी है। और हमने इसे इसको रूपया दे दिया है। उसे यहां से हटने को और चले जाने को कहना तो अपमानजनक होगा। और अगर आप नहीं आते तो वह बहुत ज्‍यादा चोट महसूस करेगी। इसलिए बाहर आयें।

किंतु विवेकानंद भयभीत थे बाहर आने में। इसीलिए मैं कहता हूं कि तब तक अप्रौढ़ थे।तब तक भी पक्‍के संन्‍यासी नहीं हुए थे। अभी भी तटस्‍थता मौजूद थी। मात्र निंदा थी। एक वेश्‍या? वे बहुत क्रोध में थे, और वे बोले,नहीं। फिर वेश्‍या ने गाना शुरू कर दिया। उनके आये बिना। और उसने गया एक संन्‍यासी का गीत। गीत बहुत सुंदर था। गीत कहता है: मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल सही; यह मालूम मैं मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम?

कहते है, विवेकानंद ने अपने कमरे में सुना। वह वेश्‍या रो रही थी। और गा रही थी। और उन्‍होंने अनुभव किया-उस पूरी स्‍थिति का। उन्‍होंने तब अपनी और देखा कि वे क्‍या कर रहे है? बात अप्रौढ़ थी, बचकानी थी। क्‍यों हों वे भयभीत? यदि तुम आकर्षित होते हो तो ही भय होता है। तुम केवल तभी स्‍त्री से भयभीत होओगे। यदि तुम स्‍त्री के आकर्षण में बंधे हो। यदि तुम आकर्षित नहीं हो तो भय तिरोहित हो जाता है। भय है क्‍या? तटस्थता आती है बिना किसी विरोधात्‍मकता के।

वे स्‍वयं को रोक ने सके, इसलिए उन्‍होंने खोल दिये थे द्वार। वे पराजित हुए थे एक वेश्‍या से। वेश्‍या विजयी हुई थी; उन्‍हें बाहर आना ही पडा। वे आये और बैठ गये। बाद में उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा, ईश्‍वर द्वारा एक नया प्रकाश दिया गया है मुझे। भयभीत था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी। मेरे भीतर। इसीलिए भयभीत हुआ मैं। किंतु उस स्‍त्री ने मुझे पूरी तरह से पराजित कर दिया था। और मैंने कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा। वे अश्रु इतने निर्दोष थे। और वह नृत्‍य गान इतना पावन था कि मैं चूक गया होता। और उसके समीप बैठे हुए, पहली बार मैं सजग हो आया था। कि बात उसकी नहीं है जो बाहर होता है। महत्‍व इस बात का है जो हमारे भीतर होता है।
उस रात उन्‍होंने लखा अपनी डायरी मैं; “अब मैं उस स्‍त्री के साथ बिस्‍तर में सो भी सकता था। और कोई भय न होता।” वे उसके पार जा चूके थे। उस वेश्‍या ने उन्‍हें मदद दी पार जाने में। यह एक अद्भुत घटना थी। रामकृष्‍ण न कर सके मदद, लेकिन एक वेश्‍या ने कर दी मदद।

अत: कोई नहीं जानता कहां से आयेगी। कोई नहीं जानता क्‍या है बुरा? और क्‍या है अच्‍छा? कौन कर सकता है निश्‍चित? मन दुर्बल है और निस्‍सहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण तय मत कर लेना। यही है अर्थ तटस्‍थ होने का।
– #ओशो
[पतंजलि: योग सूत्र भाग—1]

04 जनवरी 2018

दधीचि थे स्वतंत्रता सेनानी लाला बाबू, जानिए कैसे... बरबीघा के लिए खास

बरबीघा के दधीचि थे अंग्रेजों से लड़ने में अग्रणी रहने वाले लाला बाबू
118वीं जयंती पर विशेष



अरुण साथी की प्रस्तुति

अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने में अग्रणी रहने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद श्री कृष्ण मोहन प्यारे सिंह उर्फ लाला बाबू की आज 118 वीं जयंती विभिन्न शैक्षणिक और सामाजिक संस्थानों के द्वारा धूमधाम से मनाई जाएगी। लाला बाबू को बरबीघा का दधीचि कहा जाता है। इन्होंने दर्जनों शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की। समाज सेवा  को प्रथम कर्तव्य मान निभाते थे।
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लाला बाबू स्वतंत्रता के आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और अंग्रेजों के दांत खट्टे करते रहे। लाला बाबू का जन्म 4 जनवरी 1901 को बरबीघा प्रखंड के तेउस गांव में हुआ था। उनके पिता नाम द्वंद बहादुर सिंह था।

गांधी जी के आह्वान पे पढ़ाई छोड़ आज़ादी की लड़ाई में कूदे

1911 में बी एन कॉलेजिएट हाई स्कूल से इन्होने मैट्रिक की परीक्षा पास की तथा बीएन कॉलेज में नामांकन कराया। पुनः महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।
1928 में पुनः बीएन कॉलेज में वकालत की पढ़ाई प्रारंभ की। लाला बाबू ने 1933 में मुंगेर जिला परिषद के सदस्य चुने गए। 1948 में मुंगेर जिला परिषद के उपाध्यक्ष बने। 1950 में उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।


बरबीघा के पहले विधायक रहे

1952 से 1957 तक बरबीघा विधानसभा क्षेत्र के पहले विधायक रहे। जबकि 1957 से 1958 में 1 वर्ष तक राज्यसभा के सदस्य रहे। 1958 से 12 वर्षों तक लगातार बिहार विधान परिषद के सदस्य के रूप में लाला बाबू ने अपनी सेवा प्रदान की। 1955 से 1960 तक बिहार विश्वविद्यालय के सीनेट एवं सिंडिकेट सदस्य रहे। 1961 से 1971 तक लगभग 10 वर्षों तक भागलपुर विश्वविद्यालय के सिंडिकेट के सदस्य रहे।

कई बार अंग्रेजों के जेल में डाला

लाला बाबू अंग्रेजों से लोहा लेते हुए कई बार जेल गए। 1930 में लगभग 5 महीने तक जेल में रहे। जबकि 1932 में 6 माह  अंग्रेजों ने जेल में रखा।
1941 में 4 महीने, 1942 में 6 महीने और 1943 में 1 वर्ष 5 महीने तक अंग्रेजों ने लाला बाबू को कैद करके रखा।

दर्जनों शैक्षणिक संस्थान खोले

लाला बाबू ने कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना भी की जिसमें आर डी कॉलेज शेखपुरा, के के यस कॉलेज जमुई, के के एस कॉलेज लखीसराय, गोड्डा कॉलेज, देवघर कॉलेज, श्री कृष्ण राम रुचि कॉलेज बरबीघा, उच्च विद्यालय बरबीघा, उच्च विद्यालय कटारी, उच्च विद्यालय मालदह, उच्च विद्यालय बभनबीघा इत्यादि प्रमुख है।

 9 फरवरी 1978 को लाला बाबू का निधन हो गया।
अपने सच्चे सपूत को बरबीघा की धरती नमन करती है।

24 दिसंबर 2017

चारा घोटाला फैसला- बैकवर्ड बनाम फॉरवर्ड

चारा घोटाला फैसला- बैकवर्ड बनाम फॉरवर्ड
अरुण साथी
चारा घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्रा के बरी होने और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के दोषी करार होने के बाद सोशल मीडिया पर इसे जातीय आधार से जोड़कर न्याय व्यवस्था पर सवाल किए जा रहे हैं।
पार्टी समर्थक अथवा साधारण लोगों के द्वारा ऐसे सवाल किए जाते है तो यह मायने नहीं रखता पर बहुत सारे काबिल और विद्वान लोगों की जातीय टिप्पणी आहत करने वाली है।
खैर, अब हम यदि न्यायिक फैसले पे गंभीरता से गौर करें तो सारे मामले साफ हो जाएंगे। देवघर कोषागार से एक 89.4 लाख की अवैध निकासी के मामले में कुल 22 आरोपी थे जिनमें से 16 दोषी करार दिए गए और 6 निर्दोष। अब न्यायिक व्यवस्था को जातिवादी चश्मे से देखने वाले लोगों को 16 दोषी करार दिए गए लोगों की जातीय पड़ताल भी करनी चाहिए। जिन 16 लोगों को दोषी करार दिया गया है उनमें लालू प्रसाद यादव के अलावा बिहार के पूर्व सांसद जगदीश शर्मा, पूर्व विधायक डॉ आर के राणा, पूर्व पशुपालन सचिव बेक जूलियस, पूर्व सचिव महेश प्रसाद, पूर्व वित्त आयुक्त फूलचंद सिंह, पूर्व सरकारी अधिकारी सुधीर कुमार भट्टाचार्य, डॉ कृष्ण कुमार प्रसाद, आपूर्तिकर्ता त्रिपुरारी मोहन प्रसाद, सुशील कुमार, सुनील कुमार सिन्हा, अनिल गांधी, संजय अग्रवाल, गोपीनाथ दास, ज्योति कुमार झा एवं राजेंद्र प्रसाद शर्मा शामिल हैं। जिन लोगों को माननीय न्यायालय ने बरी करार दिया है उनमे डॉ जगन्नाथ मिश्रा के अलावा बिहार के पूर्व पशुपालन मंत्री विद्यासागर निषाद, लोक लेखा समिति के पूर्व अध्यक्ष ध्रुव भगत, आयकर आयुक्त चंद्र चौधरी, आपूर्तिकर्ता सरस्वतीचंद्र और साधना शामिल है।
अब इन उपर्युक्त नामों के जातियों का विश्लेषण करें तो समझदार लोग यह समझ सकते हैं कि अगड़े और पिछड़े दोनों जातियों के लोगों को न्यायालय में दोषी और बरी करार दिया है। न्यायालय जातीय आधार पर अपने फैसले नहीं सुनाते। साक्ष्य और गवाह न्यायालय के फैसले के लिए प्रमुख वजह होती है। हालांकि न्याय व्यवस्था की कमियों पे बड़े संदर्भों में टिपण्णी नहीं की जा सकती है। कमियों से ज्यादातर लोग बाकिफ है। यहां इस खास संदर्भ की ही चर्चा हो रही है।
बात अगर जातिवादी चश्मे से न्यायिक फैसले को देखने की है तो 3 अक्टूबर 2013 को चाईबासा कोषागार से हुए 38 करोड़ की अवैध निकासी के मामले में सीबीआई के विशेष न्यायधीश प्रभास सिंह ने लालू प्रसाद यादव को पांच साल, जगन्नाथ मिश्रा को चार साल, जगदीश शर्मा को चार साल, आरके राणा को पांच साल की सजा दी। इसी सजा के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप सभी नेता ग्यारह साल तक चुनाव लड़ने से वंचित घोषित हो गए। कुछ काबिल लोग तो यह भी कह रहे कि एक ही घोटाले में कितनी सजा होगी। उनको नहीं पता कि अलग अलग जिलों में अलग अलग प्रथमिकी दर्ज हुई है।
खैर, बिहार का 90 का दशक अपराध के जातीय समीकरण का चर्मोत्कर्ष था। उन दिनों सभी जातियों के पास अपने अपने रंगदार थे। सभी को जातीय जामा पहनाकर संरक्षित किया जाता था। उन्हीं जातियों में से कई लोग तो ऐसे थे जो अपने स्व जातियों के हत्या से भी  नहीं झिझके। वैसे कुछ लोग आज जाति संरक्षण पाकर अपनी धन संपदा बढ़ाते जा रहे हैं। अपराधियों को जाति संरक्षण मिलना एक समान सी बात है पर अपराधियों की कोई जाति नहीं होती। वे अपने हित मे जाति का उपयोग करते है।
अपराध करने वालों के लिए जातीय और धार्मिक चोला पहनना सबसे आसान है और आम लोगों का जयकारा लगाना भी परंतु विद्वान और काबिल लोग जब ऐसा करेंगे तो हमारा देश और समाज फिर से कबीलाई युग की ओर जाने को अग्रसर हो जायेगे।।। जरा सोंच के देखिये चारा घोटाले में किस जाति के गरीब लोगों का नुकसान हुआ होगा..।।

23 दिसंबर 2017

गौरी, एक प्रेमकथा 2

गौरी, एक प्रेम कथा

गोरिया!! गौरी को गांव के लोग उसी नाम से पुकारते है। गौरी से गोरिया कैसे हो गयी यह कोई नहीं जानता पर माय कहती है कि गौरी के अत्यधिक खूबसूरत होने की वजह से लोग उसे गोरिया कहने लगे। गौरी है भी बहुत खूबसूरत। 

साधारण कद काठी की गौरी हिष्ट पुष्ट है। गोल मटोल चेहरा पे बड़ी बड़ी आंखें है। उसकी आँखों को बिना काजल के आजतक किसी ने नहीं देखा। कमर तक लटके उसके बाल ज्यादातर खुले ही रहते है। गौरी उसे बार बार संभालते हुए परिश्रम करती रहती है। यह उसकी एक अदा है।

दुपट्टा उसकी छति पे कभी टिकना ही नहीं चाहता। वह बार बार सरकता है और गौरी बराबर उसे संभालती है। गौरी सब समझती है। गांव के स्कूल से पांचवीं पास जो है। गांव के लफूये गौरी को फुटबॉलवाबली के नाम से जानते है। रास्ते में कई बार उसे छेड़ते हुए कहते "अरे यार फुटबॉल से खेले के मन है। एक नै दु दु गो से।" पर गौरी जानती है। छेड़छाड़ पे प्रतिक्रिया देने से गांववाले उसे ही दोष देंगे। वह गरीब की बेटी जो है। खैर, गोरिया गांव के मजनुओं की आह बन गयी थी। गोरिया श्रृंगार की बड़ी शौकीन थी। नेल पॉलिस रोज लगाती। दो रुपये का ही सही पर पायल और बिछिया हमेशा उसके खूबसूरत पांव का श्रृंगार बढ़ाती जिसमें एक दर्जन घुंघरू हमेशा संगीत के धुन छेड़ते। सुर ताल के साथ। मजनुओं को उस संगीत प्रेमगीत सुनाई देता। यही प्रेमगीत तो बभनटोली का लफुआ लोहा सिंह का बेटा "बंगड़वा" सुन लिया। "झुन झुन, झुन झुन..! प्रेम धुन! प्रेम धुन! प्रीतम सुन! प्रीतम चुन!" बंगड़वा को यही गीत सुनाई देता। 

बंगड़वा, गांव के चौकीदार लोहा सिंह का एक मात्र पुत्र था। लोहा सिंह, चौकीदार कम और गांव का जमींदार ज्यादा था। उसके भय से गांव के बभनटोली में भी कोई नहीं खोंखता था। कहरटोली में तो खैर लोहा सिंह मालिक ही थे। उनका एक मात्र पुत्र बंगड़वा गांव का भोजपुरी फिल्मी। भोजपुरी सिनेमा का दीवाना। बंगड़वा के खौफ की वजह खन्धे में उसी तरह से लोग भागते थे जैसे जंगल में भेड़िये के आने से सभी जीव जंतु भाग खड़े होते।

बंगड़वा ने गोरिया के रूप सौंदर्य के खूब चर्चे सुने थे। उसका असर भी बहुत था। अब उसको कहीं जाना होता तो उसका रास्ता गोरिया के घर के रास्ते से होकर ही जाता। गोरिया के पायल की झंकार उसके दिल की धड़कन थी। वह महीनों बिना कुछ बोले प्रेम रूपी कमल के उस फूल के खिलने का इंतजार करता रहा जिसकी पंखुड़ी में कैद होना हर भंवरे की पहली और अंतिम अभिलाषा होती है।

बंगड़वा के मन में क्या था वह वही जाने पर धीरे धीरे वह गोरिया से प्रेम करने लगा था। गोरिया को देखे बिना उसका मन उसी तरह तड़फड़ाने लगता जैसे बछिया के लिए उसकी गाय सुबह शाम तड़फड़ाने लगती है। गोरिया पे नजर पड़ते ही उसे लगता जैसे उसके दिल की हवेली में किसी ने भेपरलाईट जला दिया हो। उसके मन में मंदिर का घंटा बजने लगता। टनटन। टनटन।

आज तीन चार चक्कर लगाने के बाद भी गोरिया उसे दिखाई नहीं दी। वह बेचैन हो गया। उसके मन में तरह तरह के विचार आने लगे। जाने क्या हुआ होगा। बंगड़वा वैसे तो गांव का गुंडा माना जाता था और वह गोरिया के घर घुस के भी पता लगा सकता था पर उसके मन के एक कोने में गोरिया और उसके परिवार के प्रति अजीब सा लगाव था। वही लगाव भय का रूप ले चुका था। बंगड़वा को शाम तक गोरिया नहीं दिखी। वह चारा बिन भैंस सा छटपटाने लगा। उसे इस बात का आज एहसास हुआ कि उसे प्रेम हो गया है।

शाम ढलने लगी थी। गोरखिया जानवर को लेकर घर लौट रहे थे। बंगड़वा आज गाय दूहने भी नहीं गया। माय उसको कहाँ कहाँ ढूंढ रही होगी और वह बुढ़वा पीपल के पेंड के नीचे चुपचाप बैठा था। पीपल के पेड़ के पास से भी गांव के लोग शाम ढलने के बाद नहीं निकलते थे। रास्ता काट लेते। किच्चिन का बास था इसमें। जोईया के माय मारने के बाद से इसी पीपल के पेंड पे रहती है। कई लोगों ने देखा है। शाम होते ही उज्जड बगबग साड़ी पहले किच्चिन निकलती है। उसके पायल की आवाज पूरे गांव में गूंजता है। बंगड़वा भी कई बार सुना है। आज उसे किसी बात की परवाह ही नहीं। वह जैसे सुध बुध खो चुका हो। वह टुकटुक गोरिया के घर की तरफ देख रहा है। दूर से ही सही, गोरिया दिखेगी तो वह पहचान लेगा। अंधेरा होने लगा था पर वह टस से मस नहीं हुआ। पता नहीं क्यों उसे लगता गोरिया घर से निकलेगी और अंधेरे में भी चमचम चमकने लगेगी। उसका मन तो यह भी कहता कि गोरिया उसकी दिल की आवाज अवश्य सुन रही होगी। सिनेमा में उसने देखा है। प्रेम निःशब्द होकर भी बोलता है। हीरोइन दिल की आवाज सुन लेती है। उसे भी लगने लगा कि गोरिया आज इसी पीपल के पेड़ के पास सजधज के आएगी और पायल की धुन पे  डांस करेगी....तभी जो उसने सुना और देखा तो उसकी आंखें खुली की खुली रह गयी। जोगिया के माय किच्चिन उसके सामने थी.....

शेष अगले क़िस्त में, इंतजार करिये..

22 दिसंबर 2017

ॐ घोटालाय नमो नमः.. अथ श्री घोटाला मंत्र

घोटाला एक काल्पनिक, सार्वभौमिक और राजनीतिक शब्द है..

घोटाला एक काल्पनिक, सार्वभौमिक और राजनीतिक शब्द है। इसका आविष्कार वैसे तो बहुत पहले ही हो गया था परंतु यह प्रचलन में बोफोर्स घोटाले से अधिक तब आया जब इस शब्द का प्रयोग राजनीतिक उपयोग के लिए किया जाने लगा। हालांकि चारा घोटाले के बाद यह सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ पर चारा घोटाले को समर्थक घोटाला नहीं मानते और विरोधी मानते है।


घोटाला मंत्र 

ॐ घोटालाय "नमो नमः" स्वाहा! ॐ हुयम ट्यूम "नमो नमः "टूजी स्वाहा! ॐ "नमो नमः" दामाद जी धरती हँसोताय "नमो नमः" स्वाहा!! ॐ सुखराम बाबाय अपना बनाय स्वाहा!! 

घोटाला का प्रभाव

घोटाला का प्रभाव बहुत प्रभावशाली होता है। खासकर तब, जब कि इसका उपयोग करनेवाला राजनीतिज्ञ बहुत ही प्रभावशाली हो तथा अपनी बुद्धि और विवेक इस्तेमाल कर वह घोटाले के बाद उतपन्न प्रभाव का लाभ उठाने की कला में परांगत हो।

घोटाले का इस्तेमाल

घोटाला का सबसे बेहतरीन इस्तेमाल राजनीतिज्ञ करना जानते हैं। सबसे पहले यह पता लगाना होता है कि किसने घोटाला किया है। फिर उस घोटाले के तिल को ताड़ बनाना पड़ता है। साथ-साथ आपको राई का पहाड़ ही बनाना पड़ेगा। और जब राई का पहाड़ बन जाएगा तब आप इसका लाभ उठा सकते हैं।

घोटाले का कुप्रभाव

घोटाले का सबसे अधिक कुप्रभाव आम आदमी पर पड़ता है। इसका इस्तेमाल करने वाले जानते हैं कि आम आदमी इमोशनल होता है और वह इमोशनल अत्याचार करने में माहिर खिलाड़ी। कभी-कभी घोटाले को वास्तविक बनाने के लिए कुछ नेताओं को जेल भी जाना पड़ता है। हालांकि उन्हें जेल में स्वर्गीय सुख भी उपलब्ध करा दिया जाता है।

घोटाले का दुष्परिणाम

घोटाले का दुष्परिणाम बहुत ही व्यापक और गंभीर होता है और यह उसी दीमक की तरह है जो दीमक बड़े बड़े दरख़्त को भी धीरे खोखला कर मिट्टी में मिला देता है। इसीका दुष्परिणाम है के आम आदमी वहीं के वहीं है और देश की अस्सी प्रतिशत धन कुछ लोगों के पास चला गया है।

घोटाले का सुप्रभाव

इसका सुप्रभाव आप अपने आसपास भी देख सकते हैं। कुछ लोग चंद दिनों में वहां पहुंच जाते हैं जहां वह आम आदमी के साथ उठने-बैठने, बोलने-बतियाने में कतराने लगते हैं। उनसे मिलने के बाद एरोप्लेन, अमेरिका, इंग्लैंड इत्यादि की बात करते है। उनसे मुलाकात करना उतना ही कठिन हो जाता है जितना कठिन मंदिर में भगवान से मुलाकात करना। बड़ी बड़ी गाड़ियों से चलते हुए ऐसे लोगों को देख मेहनत-मजदूरी करने वाला आदमी अपने अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर लेता है। और हाँ ऐसे लोग या तो राजनीति करते है या करने के लिए छटपटाहट में पाए जाते है।

घोटाले का संरक्षक

घोटाला एक सार्वभौमिक, काल्पनिक और राजनीतिक शब्द भले ही है परंतु इसकी पैठ सभी जगह है क्योंकि यह सार्वभौमिक और सर्वमान्य है। इसलिए हम किसी एक पर इसको स्थापित नहीं कर सकते। इसी की वजह से हम कह सकते हैं कि घोटाले का संरक्षक हम सभी बन जाते हैं। भले ही इसका एहसास हमें बाद में हो अथवा नहीं भी हो। इसके सबसे बड़े संरक्षक राजनीतिज्ञ होते हैं क्योंकि वे पटल पर आकर इसका संरक्षण करते हैं। राजनीतिज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में घोटाला एक सर्वमान्य, सार्वभौमिक शब्द है और इसकी अवहेलना अथवा अवमानना कर हम लोकतंत्र की चुनावी व्यवस्था में नहीं चल सकते जहां आम वोटर भी इसी घोटाले के प्रतिफल से उत्पन्न हरे-हरे अथवा अब गुलाबी या गेरुआ गाँधीजी प्राप्त कर सुख का अनुभव करते हैं।

घोटाले का निष्कर्ष

घोटाले का निष्कर्ष मघ्घड़ चाचा से सुनिये।
" सब मिले हुए हैं जी! ॐ घोटालाय नमो नमः.. अथ श्री घोटाला मंत्र का जाप और अपना तिजौरी भरो! देखे नहीं जमीन घोटाला वाला दामाद जी जेल गया! केजरू भैये ने शिला जी को जेल भेज दिया! सुखराम आज राम राम करने लगा! टूजी वाले के पीछे काहे पड़े है सब! जब घोटाला काल्पनिक है तो आप सब भी कल्पना कर लीजिए...का का पिलान बना होगा.. चुनाव हे जी...उनके राज में....कल्पना करिए..मस्त रहिये..बाकी राम राम जपना, पराया माल अपना...।"

#अरुण_साथी/22/12/17

बिहार में जातीय उन्माद फैला कर मानव श्रृंखला असफल करने की हो रही साजिश..

बिहार में मानव श्रृंखला पे जातीय असर बरबीघा में जातीय नफरत मत फैलाओ शेखपुरा/बिहार बिहार में दहेज प्रथा और बाल विवाह के विरोध में बनने वाल...